विशेष संवाददाता, ‘द रियल इनसाइट इंडिया’
उज्जैन: मक्सी रोड उद्योगपुरी स्थित ‘इंडिया फास्फेट’ (India Phosphate) फैक्टरी में चल रहा श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन और पीएफ (PF) का महा-घोटाला अब किसी एक कारखाने की मनमानी तक सीमित नहीं रह गया है। यह उज्जैन के श्रम विभाग और भविष्य निधि (EPFO) कार्यालय के उच्च अधिकारियों की संलिप्तता, कार्यप्रणाली और घोर लापरवाही का एक जीता-जागता दस्तावेज बन चुका है।
फैक्टरी के भीतर गरीब मजदूरों से 10-10 घंटे की अमानवीय बेगार कराई जा रही है, उनकी हाजिरी कागजों में काटी जा रही है, और इन सबके बावजूद जिम्मेदार उच्च अधिकारी एयरकंडीशन कमरों में बैठकर अपनी आंखें मूंदे हुए हैं।
श्रम विभाग के उच्च अधिकारियों की चुप्पी: क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों तक सीमित?
मध्य प्रदेश श्रम विभाग और उज्जैन के श्रम आयुक्त (Labor Commissioner) के पास औद्योगिक इकाइयों के नियमित और औचक निरीक्षण के असीमित अधिकार हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि मक्सी रोड की इस इंडिया फास्फेट फैक्टरी में महीनों से चल रहे इस काले खेल की भनक क्या स्थानीय श्रम निरीक्षकों और उच्च अधिकारियों को नहीं थी?
भ्रष्ट ‘इंस्पेक्टर राज’: नियमों के मुताबिक फैक्टरी के बायोमेट्रिक सर्वर और अटेंडेंस रजिस्टर की जांच करना श्रम विभाग का प्राथमिक दायित्व है। परंतु, ऐसा प्रतीत होता है कि दफ्तर के उच्च अधिकारियों और प्रबंधन के बीच किसी गहरी सांठगांठ के चलते कागजी खानापूर्ति कर फाइलों को दबा दिया जाता है।
शिकायतों पर लीपापोती: जब भी श्रमिक अपने हक की आवाज उठाने या कम वेतन की शिकायत लेकर श्रम विभाग के चक्कर काटते हैं, तो अधिकारियों द्वारा उनकी फाइलों को तकनीकी पेचीदगियों में उलझाकर टाल दिया जाता है। उच्च अधिकारियों की इस उदासीनता ने फैक्टरी प्रबंधन के हौसले सातवें आसमान पर पहुंचा दिए हैं।
पीएफ (EPFO) कमिश्नर और प्रवर्तन अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे गंभीर सवाल
भविष्य निधि (PF) और पेंशन फंड बचाना EPFO के क्षेत्रीय आयुक्त (PF Commissioner) और उनके प्रवर्तन अधिकारियों (Enforcement Officers) की कानूनी जिम्मेदारी है। लेकिन इंडिया फास्फेट के मामले में पीएफ दफ्तर की कार्यशैली ने कई बड़े संदेह खड़े कर दिए हैं:
30 दिन के काम पर 20 दिन की ECR रिपोर्ट स्वीकार करना: जब फैक्टरी प्रबंधन ऑनलाइन पोर्टल पर महीने में सिर्फ 20 दिन की हाजिरी (NCP Days) दर्ज कर डेटा भेजता है, तो क्या पीएफ कार्यालय के सॉफ्टवेयर या ऑडिट अधिकारियों की नजर इस असामान्य आंकड़े पर नहीं पड़ती?
सांठगांठ की बू: जानकारों का मानना है कि बिना उच्च स्तर की शह या मिलीभगत के कोई भी कंपनी इस स्तर का डिजिटल फर्जीवाड़ा लंबे समय तक नहीं चला सकती। पीएफ अधिकारियों द्वारा फैक्टरी के बिजली खपत के बिल (Power Consumption Bills) और वास्तविक कर्मचारियों की संख्या का मिलान जानबूझकर नहीं किया जा रहा है, जिससे कर्मचारियों के बुढ़ापे की गाढ़ी कमाई पर डाका डाला जा रहा है।
मजदूरों का दर्द और सिस्टम की क्रूरता
एक तरफ मक्सी रोड की इस इंडिया फास्फेट फैक्टरी में मजदूर पसीना बहा रहा है, अपने परिवार का पेट पालने के लिए 10-10 घंटे मशीन पर खड़ा रहता है, और दूसरी तरफ श्रम व पीएफ विभाग के आला अधिकारी अपनी कुर्सियों पर बैठकर इस शोषण का तमाशा देख रहे हैं।
मजदूर यदि आवाज उठाए तो नौकरी जाने का डर, और चुप रहे तो तिल-तिल कर टूटने की मजबूरी—यही इस व्यवस्था का कड़वा सच बन चुका है।
‘द रियल इनसाइट इंडिया’ की उच्चाधिकारियों को सीधी चेतावनी
‘द रियल इनसाइट इंडिया’ अब इस पूरे मामले को राज्य शासन, श्रम मंत्रालय और उच्च स्तर पर उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है। हमारी स्पष्ट मांग है कि:
श्रम आयुक्त, मध्य प्रदेश तत्काल प्रभाव से उज्जैन के स्थानीय श्रम अधिकारियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच बैठाएं।
क्षेत्रीय पीएफ कमिश्नर इंडिया फास्फेट फैक्टरी के पिछले एक साल के ECR डेटा और बायोमेट्रिक अटेंडेंस का फॉरेंसिक ऑडिट करवाकर तुरंत रिकवरी और एफआईआर (FIR) दर्ज करें।
कार्रवाई हो: यदि जिम्मेदार उच्च अधिकारियों ने अपनी कार्यशैली नहीं सुधारी, तो इस प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ सड़कों से लेकर न्यायालय तक बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा।
