विशेष संवाददाता, ‘द रियल इनसाइट इंडिया’
उज्जैन: सुबह के ठीक आठ बज रहे हैं। उज्जैन की मक्सी रोड उद्योगपुरी का मोड़। धूल उड़ाती गाड़ियों के बीच साइकिलों और पैदल चलते कदमों का एक जनसैलाब ‘इंडिया इंडिया फास्फेट फैक्टरी के लोहे के भारी गेट के भीतर दाखिल होता है। चेहरे पर धूल और आंखों में परिवार का पेट पालने की मजबूरी लिए ये मजदूर यह सोचकर अंदर जाते हैं कि वे ईमानदारी का पसीना बहा रहे हैं। लेकिन उन्हें अंदाजा भी नहीं होता कि गेट पार करते ही वे एक ऐसे अदृश्य ‘सिस्टम’ का शिकार बनने जा रहे हैं, जिसकी पटकथा फैक्टरी के एसी केबिन से लेकर शहर के सरकारी दफ्तरों तक पहले ही लिखी जा चुकी है।
अध्याय 1: गेट पास से शुरू होता है पहला धोखा (10 घंटे की बेगार)
फैक्टरी का गार्ड गेट पर डायरी में इंट्री करता है और बायोमेट्रिक मशीन पर मजदूर का अंगूठा लगता है। घड़ी में टाइम होता है—सुबह 8:00 बजे। शाम के 6:00 बज चुके हैं, 8 घंटे की कानूनी ड्यूटी पूरी हो गई है। मजदूर थक कर चूर हो चुका है और घर लौटने की तैयारी में है। तभी सुपरवाइजर की रोबदार आवाज गूंजती है—”दो घंटे और रुकना पड़ेगा, काम बाकी है।”
मजदूर जानता है कि कानूनन 8 घंटे से ज्यादा काम कराने पर double ओवरटाइम मिलना चाहिए। लेकिन यहाँ कोई हिसाब नहीं होता। शाम 6 से रात 8 बजे तक के ये अतिरिक्त 2 घंटे कागजों में दर्ज ही नहीं किए जाते। मजदूर महीने में 60 घंटे अतिरिक्त खटता है, पर जेब में एक रुपया भी नहीं आता। बिना दर्ज हुआ यह ओवरटाइम प्रबंधन के लिए हर महीने लाखों रुपये की सीधी ‘ब्लैक मनी’ बनता है।
अध्याय 2: कंप्यूटर की स्क्रीन पर ‘जादू का खेल’ (30 दिन का काम, 20 दिन की हाजिरी)
महीना खत्म होता है। मजदूर जानता है कि उसने महीने के पूरे 30 दिन काम किया है। लेकिन असली जादू तो फैक्टरी के अकाउंट्स डिपार्टमेंट में होता है।
मान लीजिए मजदूर को महीने की कुल मजदूरी ₹9,000 थमाई गई। अगर 30 दिन के हिसाब से देखें, तो उसकी एक दिन की मजदूरी बनती है सिर्फ ₹300। अब अगर श्रम विभाग यह रिकॉर्ड देख ले, तो फैक्टरी पर सीधा गाज गिरेगी, क्योंकि उज्जैन कलेक्टर का न्यूनतम रेट (कलेक्टर रेट) इससे कहीं ज्यादा है।
यहाँ काम आता है पेरोल सॉफ्टवेयर का ‘जादू’।
कंप्यूटर में बैठा ऑपरेटर एक क्लिक करता है। मजदूर की 30 दिन की हाजिरी को घटाकर 20 दिन कर दिया जाता है। अब गणित बदल जाता है:
9000÷20=450
कागजों पर चमत्कार हो चुका है! अब ऐसा लगता है जैसे फैक्टरी मजदूर को ₹450 रोजाना (कलेक्टर रेट) दे रही है। कागजों में नियम का पूरा पालन दिखता है, लेकिन हकीकत में मजदूर के 10 दिनों का वजूद ही मिटा दिया गया है।
अध्याय 3: पीएफ दफ्तर की साठगांठ और ‘सेटिंग’ का नेटवर्क
अब यह फर्जी डेटा पेनड्राइव में अपलोड होता है और पहुँचता है भविष्य निधि (EPFO) कार्यालय। ईपीएफओ के पोर्टल पर फैक्टरी ECR (इलेक्ट्रॉनिक चालान-कम-रिटर्न) फाइल करती है।
नियम के मुताबिक, 30 दिन की पूरी मजदूरी पर कंपनी को अपनी जेब से 12% पीएफ फंड में डालना चाहिए था। लेकिन जब हाजिरी ही 20 दिन दिखाई गई, तो कंपनी का पीएफ अंशदान भी सीधा 33% घट गया।
सवाल उठता है कि पीएफ दफ्तर के अधिकारी यह पकड़ क्यों नहीं पाते?
जब कभी श्रम विभाग या पीएफ दफ्तर की टीम ‘औचक निरीक्षण’ का नाटक करती है, तो मक्सी रोड की इस फैक्टरी में सूचना पहले ही पहुँच जाती है। निरीक्षण के दिन गेट का असली रिकॉर्ड अलमारी में बंद कर दिया जाता है और अफसरों की टेबल पर वही 20 दिन वाला फर्जी रजिस्टर परोस दिया जाता है। ‘चाय-पानी’ और साठगांठ की मेज पर फाइल पर हरी सील लग जाती है—”सब कुछ नियमानुसार पाया गया।”
अध्याय 4: मजबूरी का घूंट, चुपचाप सहता मजदूर
मजदूर बेवकूफ नहीं है। उसे सब समझ आता है कि उसने 30 दिन हाड़तोड़ मेहनत की है, लेकिन उसके हाथ में मिलने वाला पैसा और पीएफ का हिसाब-किताब आधा-अधूरा है।
लेकिन वह किसी अफसर या दफ्तर का दरवाजा खटखटाने की सोच भी नहीं सकता। घर में बूढ़े मां-बाप की दवाइयां हैं, बच्चों की स्कूल फीस है और चूल्हा जलाने के लिए राशन लाना है। अगर वह ज़रा सी भी आवाज उठाएगा या अपने हक की बात करेगा, तो अगले ही दिन उसे फैक्टरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।
नौकरी छूटने का खौफ और परिवार का पेट पालने की लाचारी के आगे वह अपनी आत्मा और स्वाभिमान को मार देता है। वह जानता है कि इस भ्रष्ट सिस्टम से लड़ने की ताकत उसके पास नहीं है, इसलिए वह खून के घूंट पीकर चुपचाप अगले दिन फिर उसी 10 घंटे की बेगार में जुटने को मजबूर हो जाता है।
‘द रियल इनसाइट इंडिया’ का कड़ा संदेश
मजदूर की इस खामोशी और लाचारी का फायदा उठाकर फैक्टरी मालिक अपनी तिजोरियां भर रहे हैं और तंत्र के नुमाइंदे अपनी आंखें मूंदे बैठे हैं।
यह महज एक खबर नहीं, बल्कि उस पूरे संगठित ‘सिंडिकेट’ का पर्दाफाश है जो गरीब के पसीने को निचोड़कर अपनी जेबें गर्म कर रहा है।
हमारी मांग है:
उज्जैन कलेक्टर और श्रम आयुक्त मक्सी रोड स्थित इंडिया फास्टफेड के बायोमेट्रिक सर्वर और गेट पास की निष्पक्ष साइबर जांच कराएं।
पीएफ कमिश्नर फैक्टरी के बिजली खपत बिल, गेट पास और ईपीएफओ ECR का फॉरेंसिक मिलान कराएं।
कागजों में हेरफेर करने वाले प्रबंधन और मिलीभगत करने वाले अधिकारियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
‘द रियल इनसाइट इंडिया’ मक्सी रोड उद्योगपुरी के इन मूक-बधिर बनाए गए मजदूरों की आवाज लगातार उठाता रहेगा।