महा-खुलास
भोपाल कुर्सी तोड़ रहे कार्यपाल यंत्री को सौंपे 3 जिलों के अतिरिक्त सहायक यंत्री का प्रभार।
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के विकसित मध्यप्रदेश को पलीता लगा रहे भ्रष्ट अधिकारी।
विशेष खोजी रिपोर्ट: राहुल विश्वकर्मा
उज्जैन / भोपाल। मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड (MP Mandi Board) में तकनीकी मॉनिटरिंग और प्रशासनिक जवाबदेही का सिस्टम किस कदर ध्वस्त हो चुका है, इसका एक और सनसनीखेज उदाहरण मंदसौर और नीमच जिलों से सामने आया है। खोजी समाचार चैनल ‘The Real Insight India News’ की पड़ताल में जो नए और पुख्ता तथ्य सामने आए हैं, वे सीधे मंडी बोर्ड के आला अफसरों और भोपाल मुख्यालय की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़े करते हैं।
सवाल यह है कि जिस तकनीकी अधिकारी को सरकारी नियमों के तहत हर 3 से 4 साल में ट्रांसफर कर दिया जाना चाहिए था, वह पिछले 12 सालों से एक ही संभाग में कैसे काबिज है?
क्या पूरा मंडी बोर्ड सिस्टम इतना पंगु हो चुका है कि एक ही अधिकारी को दो-दो कार्यपालन यंत्री (EE) कार्यालयों, मंदसौर-नीमच में सहायक यंत्री (AE) के पदों और भोपाल मुख्यालय की ‘बड़ी कुर्सी’ का प्रभार देकर पूरी व्यवस्था को ही एक व्यक्ति के हाथों में गिरवी रख दिया गया है?
प्रशासनिक रिकॉर्ड का अनोखा अजूबा: 3 जिलों का प्रभार और भोपाल की ‘बड़ी कुर्सी’
सरकारी नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था के तहत किसी भी अधिकारी का तबादला पारदर्शिता बनाए रखने के लिए 3 से 4 वर्षों के भीतर होना अनिवार्य है। लेकिन मंडी बोर्ड के प्रभारी तकनीकी अधिकारी (EE) मधुकर राव पवार के मामले में यह नियम हवा-हवाई साबित हो रहा है:
12 साल का लंबा( विवादित )कार्यकाल:
मोहन सरकार के भ्रष्टाचार पर कड़े रुख की नीति के बावजूद, मुख्य रूप से उज्जैन में पदस्थ मधुकर राव पवार पिछले लगभग 12 वर्षों से इसी संभाग में कार्यपालन यंत्री (EE) के पद पर लगातार जमे हुए हैं। इसी जगह से अपने भ्रष्टाचार के पौधे को पनपाया जो आज विशाल वृक्ष बन चुका है, बड़ी बात ये है कि सीएम के गृह जिले में ये भ्रष्टाचार लंबे अरसे से चलता आ रहा है। प्रदेश के मुखिया की नजर से बच कर सालों से भ्रष्टाचार कर रहे पंवार की शिकायत जल्द ही प्रदेश के मुखिया तक भी पहुंचेगी और पूरी उम्मीद है कि इनकी सेवानिवृत्ति से पहले इनके कार्यकाल में किए गए तमाम भ्रष्टाचारों को लेकर इन्हें विशेष सम्मान प्रदान किया जाएगा।
आखिर किसकी मेहरबानी पर मिले मंदसौर-नीमच जिले के अतिरिक्त प्रभार:
पिछले 3 वर्षों से पंवार के पास उज्जैन के साथ-साथ मंदसौर और नीमच जिलों के ईई (EE) का भी अतिरिक्त प्रभार है। बता दें कि मंडी बोर्ड में वरिष्ठ अभियंताओं की कोई कमी नही है, प्रदेश मंडी बोर्ड में एक से एक होनहार और काबिल अभियंता कार्यरत होकर सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार में महारत हासिल कर चुके पंवार को 3 अतिरिक्त जिलों के प्रभार उनकी काबिलियत देख कर नही दिए ये उनकी भ्रष्ट कार्यशैली देख कर दिए गए है, सूत्रों के मुताबिक इस मेहरबानी के पीछे जो साहब हैं उनका कहना है ” तुम भी खाओ , हमे भी खिलाओ”।
भोपाल मुख्यालय में पंवार का पावर:
अपनी विशिष्ट कार्यशैली और मीठी मीठी बातों से जादू करने वाले पंवार को उनकी भ्रष्ट कार्यशैली पर विभाग ने इनाम देते हुए प्रभारी अधीक्षण यंत्री (Superintending Engineer – SE) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली पद की जिम्मेदारी सौंप दी। जबकि इतने महत्वपूर्ण पद पर सुशोभित होने के लिए पंवार अक्षम है।
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा तकनीकी पेंच: मंदसौर-नीमच में ‘सहायक यंत्री’ का चार्ज, खुद ही नापा और खुद ही किया पास!
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक और तकनीकी खेल तब उजागर हुआ, जब यह पता चला कि पवार साहब के पास सिर्फ अधीक्षण यंत्री (SE) और कार्यपालन यंत्री (EE) का ही नहीं, बल्कि मंदसौर और नीमच जिले में सहायक यंत्री (Assistant Engineer – AE) का भी पिछले 2 से 3 साल से अतिरिक्त प्रभार है।
14 महीनों में सिर्फ 5 से 7 दौरे: कैसे हुआ MB बुक और मौके का सत्यापन?
तकनीकी नियमों के मुताबिक, किसी भी निर्माण कार्य की माप पुस्तिका (Measurement Book – MB) को ग्राउंड पर जाकर भरने, मौका निरीक्षण करने और उसका सत्यापन (Verification) करने की प्राथमिक जिम्मेदारी सहायक यंत्री (AE) की होती है। इसके बाद कार्यपालन यंत्री (EE) उसका क्रॉस-वेरिफिकेशन करता है और सबसे अंत में अधीक्षण यंत्री (SE) गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।
जब से पवार साहब ने भोपाल मुख्यालय में अधीक्षण यंत्री (SE) का प्रभार संभाला है, तब से लेकर अब तक उन्होंने मंदसौर और नीमच क्षेत्र के मुश्किल से केवल 5 से 7 दौरे ही किए होंगे। अब सोचने वाली बात यह है कि इतनी कम हाजिरी में उन्होंने मंदसौर और नीमच की मंडियों में जाकर मौका निरीक्षण कब किया? उन्होंने माप पुस्तिका (MB) का भौतिक सत्यापन कब किया?
हकीकत यह है कि बंद कमरों और वातानुकूलित (AC) दफ्तरों में बैठकर ही खुद ही सहायक यंत्री (AE) बनकर MB बुक भरी गई, खुद ही कार्यपालन यंत्री (EE) बनकर करोड़ों रुपये के बिलों पर दनादन सिग्नेचर किए गए और खुद ही अधीक्षण यंत्री (SE) बनकर अपनी ही जांच को क्लीन चिट दे दी गई! जब तकनीकी तौर पर काम को नापने वाला, जांचने वाला और अंतिम पास करने वाला एक ही व्यक्ति हो, तो मंडियों के निर्माण की गुणवत्ता भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ेगी।
सीएम मोहन यादव के विकसित मध्यप्रदेश संकल्प को पलीता लगा रहे मंडी बोर्ड के भ्रष्ट।
मंदसौर और नीमच की मंडियों में चल रहे करोड़ों रुपये के मेंटेनेंस कार्यों के इस पूरे गोलमाल में सबसे बड़ा और हैरान करने वाला विरोधाभास सीधे नेतृत्व और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच देखने को मिल रहा है एक तरफ मुख्यमंत्री का भागीरथी प्रयास डॉ. मोहन यादव अपने गृह क्षेत्र उज्जैन और पूरे संभाग को 2028 में होने वाले भव्य महाकुंभ ‘सिंहस्थ’ के लिए देश का सबसे सुंदर, व्यवस्थित और तकनीकी रूप से सुदृढ़ क्षेत्र बनाने में तन-मन से जुटे हुए हैं। मुख्यमंत्री जी स्वयं हर छोटे-बड़े निर्माण कार्य की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर सीधी नजर रख रहे हैं ताकि सिंहस्थ 2028 के समय पूरे संभाग का बुनियादी ढांचा विश्व स्तरीय दिखे। साथ ही विकसित मध्यप्रदेश के संकल्प को लेकर प्रदेश के तमाम इलाकों में दौरा करते हुए सीएम इन क्षेत्रों की बुनियादी और तकनीकी जरूरतों पर विशेष कार्य करने हेतु जिम्मेदार अधिकारियों को समय समय पर निर्देशित करते रहे हैं। देश की एक बड़ी आबादी का आज भी पहला व्यवसाय कहें या कार्य तो वो है “कृषि” हमारा देश कृषि प्रधान रहा है, देश के किसानों के लिए कृषि से जुड़ी हर व्यवस्था के लिये राज्य एवं केंद्र सरकार प्रतिबद्ध है, सरकारों द्वारा हर साल करोड़ो रूपए इन मंडियों में भेजे जाते हैं ताकि वहां किसान और उपज के लिए उचित व्यवस्था हो सके लेकिन जिम्मेदार पद पर बैठे पंवार जैसे भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारी इन योजनाओं को ऊपर ही निपटा देते हैं।
किसानों की उम्मीद “जिम्मेदार अधिकारी” लेकिन कुर्सी पर बैठे मक्कार “।
मंडी बोर्ड की कई बड़ी कुर्सियों पर एक साथ बैठे प्रभारी अधीक्षण यंत्री (SE) व कार्यपालन यंत्री (EE) मधुकर राव पवार शायद भोपाल मुख्यालय के प्रभार की चकाचौंध में मंदसौर और नीमच की उन बड़ी मंडियों को पूरी तरह भूल चुके हैं, जहां से सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व मिलता है और हजारों किसान अपनी फसल बेचने आते हैं। पवार साहब के पास इस ऐतिहासिक बदलाव के दौर में मंडियों के जमीनी निरीक्षण के लिए वक्त ही नहीं है वे केवल प्रभारों की कुर्सियां बटोरकर फाइलों पर हस्ताक्षर करने में मग्न हैं।
प्रशासनिक नियम और विजिलेंस जांच के कड़े दायरे: ऐसे कसा जा सकता है शिकंजा।
मंडी बोर्ड में दफ्तर में बैठकर फाइलें निपटाने वाले अधिकारियों पर यदि विजिलेंस (लोकायुक्त या EOW) की नजर पड़ती है, तो जांच इन तीन कानूनी कड़ियों पर केंद्रित होगी:
1. लॉग बुक और दौरों का फर्जीवाड़ा – यदि कागजों पर या मंदसौर-नीमच की मंडियों की एम.बी. (Measurement Book) में अधिकारी का भौतिक सत्यापन और मौका निरीक्षण दर्ज है, लेकिन उस तारीख में सरकारी गाड़ी की लॉग बुक या फास्टैग (FASTag) का डेटा मैच नहीं खाता, तो यह सीधे तौर पर दस्तावेजों की कूटरचना और वित्तीय गबन का आपराधिक मामला बनता है।
2. अवकाश के दिनों में वित्तीय स्वीकृति – यदि अधिकारी केवल छुट्टी (शनिवार-रविवार) के दिनों में ही दफ्तर आकर वित्तीय फाइलों और भुगतानों को हरी झंडी दे रहे हैं, तो विजिलेंस इसे ‘विशेष अनुग्रह या मिलीभगत’ (Undue Favor) का स्पष्ट संकेत मानती है।
3. क्रॉस-वेरिफिकेशन का खात्मा – एक ही अधिकारी को मंदसौर-नीमच में AE, EE और भोपाल में SE का प्रभार देकर क्या जानबूझकर तकनीकी ऑडिट (चेक एंड बैलेंस) का पूरा सरकारी सिस्टम ही खत्म कर दिया गया?
The Real Insight India का सीधा सवाल:
“क्या मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड के आला अफसरों और भोपाल में बैठे उच्चाधिकारियों की आंखों पर पट्टी बंधी है? 12 साल से एक ही संभाग में जमे और मंदसौर-नीमच में सहायक यंत्री से लेकर भोपाल मुख्यालय में अधीक्षण यंत्री (SE) की फाइलों पर ‘रिमोट कंट्रोल’ से दस्तखत करने वाले इस अधिकारी की कार्यप्रणाली क्या आला अफसरों की मौन सहमति के बिना संभव है? जब सूबे के मुखिया खुद संभाग को संवारने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं, तब मंडी बोर्ड के ऐसे जिम्मेदार अधिकारी अपनी लापरवाही से मुख्यमंत्री जी के सपनों और सिंहस्थ 2028 की तैयारियों को पलीता लगाने का काम क्यों कर रहे हैं?
अब देखना यह है कि इस बड़े खुलासे के बाद क्या भोपाल का मंडी बोर्ड मुख्यालय अपनी गहरी नींद से जागेगा?
क्या मंडी बोर्ड के प्रबंध संचालक (MD) और राज्य की जांच एजेंसियां स्वत गंभीर प्रशासनिक चूक, प्रभारों के खेल और वित्तीय अनियमितता का संज्ञान लेकर एक निष्पक्ष और उच्च स्तरीय तकनीकी जांच (Technical Audit) के आदेश जारी करेंगी ?
या फिर सिस्टम के इस ‘चहेते’ अधिकारी को बचाने के लिए भ्रष्टाचार की फाइलों को फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
वहीं भ्रष्टाचार के इस पूरे खेल में अब प्रदेश के मुखिया से जनता इंसाफ की उम्मीद कर रही है।
*विशेष खोजी रिपोर्ट “The Real Insight India News”