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महा-खुलासा: उज्जैन संभाग की मंडियों में करोड़ों के मेंटेनेंस का ‘खेला’, RTI के जवाब से फूटा ‘मुख्यालय’ और ‘जिम्मेदार अधिकारियों’ पर बम

Rahul Vishwakarma July 12, 2026 1 minute read
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विशेष खोजी रिपोर्ट: राहुल विश्वकर्मा (founder, THE REAL INSIGHT INDIA)

उज्जैन / भोपाल। मध्यप्रदेश राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड के उज्जैन तकनीकी संभाग से भ्रष्टाचार, प्रशासनिक तानाशाही और सूचनाओं को दबाने का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे महकमे में हड़कंप मचा दिया है। संभाग के अंतर्गत आने वाले सात प्रमुख जिलों—उज्जैन, देवास, शाजापुर, आगर मालवा, रतलाम, मंदसौर और नीमच की कृषि उपज मंडियों में पिछले एक वर्ष के दौरान हुए करोड़ों रुपये के निर्माण और रखरखाव (मेंटेनेंस) कार्यों में पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी की धज्जियां उड़ा दी गई हैं।

इस महा-घोटाले की जड़ तक पहुंचने के लिए जब खोजी समाचार चैनल ‘The Real Insight India News’ के पत्रकार राहुल विश्वकर्मा ने सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम का हथियार उठाया, तो जो सच सामने आया, उसने न केवल मैदानी स्तर के अधिकारियों बल्कि भोपाल मुख्यालय में बैठे आला अफसरों की नीयत को भी पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।

भाग 1: मुख्यालय के सूचना अधिकारी की ‘तकनीकी चाल’, क्या छुपा रहा है भोपाल?

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब भोपाल स्थित मंडी बोर्ड मुख्यालय के लोक सूचना अधिकारी ने आरटीआई आवेदन का ऐसा गोलमोल और गैर-जिम्मेदाराना जवाब दिया, जिसने खुद उनकी प्रशासनिक निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

मुख्यालय द्वारा जारी आधिकारिक पत्र (क्रमांक 428, दिनांक 11/06/2026) में जानकारी देने से बचने के लिए एक सोची-समझी प्रशासनिक और तकनीकी चाल चली गई:

पदनाम का पेंच फंसाकर पल्ला झाड़ा: पत्रकार द्वारा आरटीआई आवेदन में किसी व्यक्ति विशेष का नाम न लेते हुए, सीधे “अधीक्षण यंत्री” (Superintending Engineer) के आधिकारिक पद को संबोधित कर उनके दौरा अभिलेख और यात्रा भत्तों की जानकारी मांगी गई थी।

अधिकारी का अजीबोगरीब तर्क: मुख्यालय के सूचना अधिकारी ने लिखित जवाब में तर्क दिया कि ‘मुख्यालय में वर्तमान में दो अधीक्षण यंत्री पदस्थ हैं। आपके आवेदन में स्पष्ट उल्लेख नहीं होने से चाही गई जानकारी देने में कठिनाई है।’

मुख्यालय के जवाब पर खड़े हुए गंभीर सवाल:

कानून का मखौल: आरटीआई कानून के विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी एक पद पर दो अधिकारी कार्यरत हैं, तो सूचना अधिकारी का यह विधिक दायित्व था कि वह दोनों अधिकारियों से संबंधित दौरा अभिलेख (Tour Diaries) उपलब्ध कराते। “कठिनाई है” का बहाना बनाना सीधे तौर पर आरटीआई कानून की मूल भावना की हत्या है।

आखिर डर किस बात का है?: पदनाम से मांगी गई जानकारी को व्यक्तिगत नाम का पेंच फंसाकर रोकना यह साफ इशारा करता है कि मुख्यालय स्तर पर बैठे अधिकारी भी उज्जैन संभाग के इस करोड़ों के खेल से भली-भांति वाकिफ हैं और रिकॉर्ड सार्वजनिक होने से डर रहे हैं।

भाग 2: दौरा डायरी ‘निरंक’ होने का सच — ऑफिस में बैठकर ही निपट गईं करोड़ों की फाइलें!

मुख्यालय से प्राप्त आरटीआई के जवाब ने एक और बड़ा धमाका किया है। पत्र के बिंदु क्रमांक 04 में जब अधीक्षण यंत्री के दौरों के दौरान प्राप्त यात्रा भत्ता (TA) और दैनिक भत्ता (DA) भुगतान (अवधि 01.01.2025 से वर्तमान तक) की जानकारी मांगी गई, तो विभाग ने लिखित जवाब दिया कि:

‘शाखा द्वारा… यात्रा देयक भुगतान प्रस्तुत नहीं करने से चाही गई जानकारी निरंक है।’

यह ‘निरंक’ शब्द ही इस पूरे भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी कड़ी है। सूत्रों और पुख्ता इनपुट के आधार पर इस ‘निरंक’ रिपोर्ट के पीछे का असली सच बेहद खौफनाक है:

कुर्सी से चिपके रहे जिम्मेदार अधिकारी: उज्जैन संभाग के प्रभारी तकनीकी अधिकारी (EE) मधुकर राव पवार पर आरोप है कि वे लंबे समय से उज्जैन और संभाग के अन्य जिलों की मंडियों के वास्तविक मैदानी दौरों से पूरी तरह गायब रहे हैं।

सिर्फ शनिवार-रविवार का ‘वीकेंड दौरा’: सूत्रों का दावा है कि जब भी यह अधिकारी उज्जैन आते हैं, तो वे केवल शनिवार और रविवार (शासकीय अवकाश के दिनों) में ही आते हैं।

टेबल पर बैठकर हुए ‘भौतिक सत्यापन’: फील्ड में जाकर निर्माण कार्यों को देखने के बजाय, केवल बंद कमरों और वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर ही करोड़ों रुपये के टेंडरों, बिल-वाउचरों और माप पुस्तिका (Measurement Book – MB) की फाइलों पर दनादन हस्ताक्षर (सिग्नेचर) कर दिए गए।

भाग 3: जनता की गाढ़ी कमाई का बंदरबांट, क्या थी निर्माण कार्यों की हकीकत?

उज्जैन संभाग की सात जिलों की मंडियों में सीसी रोड, आंतरिक सड़कों, विशाल गोदामों, शेड, प्लेटफॉर्म, बाउंड्रीवाल, नालियां, कार्यालय भवनों, किसान विश्राम गृहों, विद्युत और पेयजल व्यवस्था के नाम पर जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए।

नियमों के मुताबिक, भुगतान से पूर्व प्रत्येक कार्य का नियमित तकनीकी निरीक्षण, सामग्री का कंक्रीट/लैब परीक्षण और वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन (Physical Verification) अनिवार्य है। लेकिन जब अधिकारी केवल दफ्तर में बैठकर फाइलें पास कर रहे थे, तो गुणवत्ता भगवान भरोसे छोड़ दी गई:

अधूरी और घटिया सड़कें: कई मंडियों में सीसी रोड और आंतरिक सड़कें बनने के कुछ महीनों के भीतर ही उखड़ने लगी हैं।

किसानों की सुविधाओं में सेंध: किसान विश्राम गृह, शौचालय और पेयजल के नाम पर जो पैसा कागजों पर खर्च हुआ, धरातल पर उसकी स्थिति दयनीय है।

मंडियों का मौन: कई जिलों की स्थानीय मंडी समितियों ने भी इस डर से आरटीआई का जवाब नहीं दिया या अधूरा दिया, क्योंकि उनके पास तकनीकी मापदंडों का कोई वास्तविक रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।

भाग 4: आर-पार की लड़ाई, अब स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज

‘The Real Insight India News’ के इस बड़े खुलासे के बाद अब उज्जैन संभाग के किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों का आक्रोश सातवें आसमान पर है। विभाग में व्याप्त इस ‘कमीशनराज’ और सूचना छुपाने की प्रवृत्ति के खिलाफ अब एक सुर में स्वतंत्र तकनीकी जांच (Independent Technical Audit) की मांग उठ रही है।

जांच के दायरे में शामिल करने की मुख्य मांगें:

सभी ई-टेंडरों की स्क्रूटनी: पिछले एक वर्ष में जारी सभी ई-टेंडरों की स्वीकृत राशि और ठेकेदारों की सूची सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड हो।

माप पुस्तिका (MB) का भौतिक मिलान: एक स्वतंत्र तकनीकी कमेटी ग्राउंड पर जाकर नाप करे कि एम.बी. में दर्ज आंकड़े और जमीन पर हुआ काम एक समान हैं या नहीं।

क्वालिटी कंट्रोल रिपोर्ट की जांच: कंक्रीट, कोलतार और स्टील के जो लैब टेस्ट सर्टिफिकेट फाइलों में लगाए गए हैं, उनकी प्रमाणिकता की जांच हो।

मुख्यालय के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: सूचना छुपाने और आरटीआई कानून को गुमराह करने वाले लोक सूचना अधिकारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

The Real Insight India की तीखी टिप्पणी:

“यदि उज्जैन संभाग की मंडियों में हुआ करोड़ों का मेंटेनेंस कार्य पूरी ईमानदारी और तकनीकी नियमों के तहत हुआ है, तो मंडी बोर्ड के अधिकारियों के हाथ क्यों कांप रहे हैं? बिल-वाउचर, दौरा डायरी और निरीक्षण रिपोर्ट को सार्वजनिक पोर्टल पर डालने में क्या कठिनाई है? भोपाल मुख्यालय का तकनीकी पेंच फंसाकर सूचना को दबाना साफ बयां करता है कि फाइलों के पन्नों के पीछे भ्रष्टाचार की एक बहुत बड़ी कहानी दफन है।”

अब समूचे मध्य प्रदेश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस गंभीर और साक्ष्यों के साथ उजागर हुए मामले के बाद मंडी बोर्ड के प्रबंध संचालक (MD) और कृषि मंत्री क्या कदम उठाते हैं। क्या ऑफिस में बैठकर करोड़ों की फाइलें निपटाने वाले अधिकारियों पर गाज गिरेगी या फिर भ्रष्टाचार के इस खेल पर पर्दा डाल दिया जाएगा?

— विशेष खोजी रिपोर्ट, ‘The Real Insight India News’

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