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🌳 आगर–सुसनेर वन विभाग में लाखों का घोटाला: मृत पौधों पर भी खर्च, फर्जी बिल-वाउचर से लाखों का भुगतान, सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल

Rahul Vishwakarma April 23, 2026 (Last updated: May 3, 2026) 1 minute read
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आगर-मालवा जिले के आगर और सुसनेर वन विभाग में सामने आ रहा भ्रष्टाचार का मामला अब एक बड़े घोटाले का रूप ले चुका है, जिसमें करोड़ों रुपये के कार्यों के नाम पर लाखों रुपये के फर्जी बिल-वाउचर बनाकर सरकारी धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे हैं। यह मामला न केवल आर्थिक अनियमितता का है, बल्कि पूरे वन विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी तंत्र पर भी गहरे सवाल खड़े करता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2026 में वन विभाग द्वारा विभिन्न कार्यों—जैसे पौधारोपण, सिंचाई, रखरखाव एवं अन्य वन विकास गतिविधियों—के नाम पर करोड़ों रुपये के कार्य दर्शाए गए। लेकिन इन कार्यों के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति बेहद संदिग्ध है। कई स्थानों पर 50 प्रतिशत से अधिक पौधे मृत पाए गए हैं, फिर भी उन्हीं स्थानों पर सिंचाई और रखरखाव के नाम पर बिल-वाउचर तैयार कर भुगतान निकाल लिया गया। यह साफ दर्शाता है कि कागजों में कार्य पूर्ण दिखाकर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू मार्च 2026 का है, जहां वित्तीय वर्ष समाप्ति के ठीक पहले बड़ी संख्या में बिल-वाउचर तैयार किए गए। सूत्रों के अनुसार इस अवधि में कुल 1 से 1.5 करोड़ रुपये तक के बिल-वाउचर बनाए गए, और कई दिनों में प्रतिदिन 30 से 50 बिल-वाउचर तक तैयार किए गए। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि कार्यों का सत्यापन वास्तविक रूप से नहीं किया गया, बल्कि केवल कागजी औपचारिकताओं के आधार पर भुगतान स्वीकृत किया गया।

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जब किसी भी कार्य के लिए पहले उसका भौतिक सत्यापन आवश्यक होता है, तो एक ही दिन में 30 से 50 कार्यों का स्थापन (वेरिफिकेशन) आखिर कैसे किया गया? क्या संबंधित सत्यापन अधिकारी ने वास्तव में स्थल निरीक्षण किया या केवल फाइलों पर हस्ताक्षर कर दिए गए? यदि बिना निरीक्षण के सत्यापन किया गया, तो यह सीधे-सीधे शासकीय नियमों का उल्लंघन है और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

इस घोटाले का एक और गंभीर पहलू यह है कि जिन व्यक्तियों द्वारा कोई कार्य किया ही नहीं गया, उनके खातों में भी लाखों रुपये का भुगतान कर दिया गया। यह दर्शाता है कि विभाग के भीतर एक संगठित नेटवर्क सक्रिय था, जिसने फर्जी नामों, फर्जी कार्यों और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर राशि का आहरण किया। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित आर्थिक अपराध है।

पूरे मामले में रेंजर और संबंधित अधिकारियों की भूमिका अत्यंत संदिग्ध मानी जा रही है। आरोप है कि रेंजर और उनके सहयोगियों ने मिलकर इस पूरे फर्जीवाड़े को अंजाम दिया, जिसमें बिल-वाउचर तैयार करने से लेकर भुगतान स्वीकृत कराने तक की पूरी प्रक्रिया में मिलीभगत रही। बिना उच्च स्तर की सहमति और समर्थन के इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता संभव नहीं मानी जा सकती।

इस मामले को और अधिक गंभीर बनाता है स्थानीय विधायक भेरू सिंह द्वारा की गई शिकायत। विधायक ने स्वयं इस पूरे प्रकरण में  सुसनेर क्षेत्र में खैर (लकड़ी) के अवैध व्यापार में भी रेंजर की भूमिका होने की बात कही है। यदि यह आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह केवल वित्तीय घोटाला नहीं, बल्कि वन संपदा के दोहन और अवैध व्यापार का भी बड़ा मामला बन जाता है।

वन विभाग की योजनाओं का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, हरित क्षेत्र का विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है। लेकिन जब इन्हीं योजनाओं के नाम पर भ्रष्टाचार किया जाए, तो इसका सीधा प्रभाव पर्यावरण और समाज दोनों पर पड़ता है। मृत पौधों पर खर्च दिखाना और वास्तविक कार्यों की अनदेखी करना न केवल सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि पर्यावरण के साथ भी एक गंभीर धोखा है।

इस पूरे मामले में प्रशासनिक जवाबदेही भी एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है। यदि समय-समय पर निगरानी और ऑडिट सही तरीके से किया जाता, तो इतनी बड़ी अनियमितता संभव नहीं होती। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि या तो निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल रहा या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं।

अब आवश्यकता है कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए, जिसमें सभी बिल-वाउचर, भुगतान रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजैक्शन, और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की गहराई से जांच हो। साथ ही दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इस प्रकार के घोटालों पर अंकुश लगाया जा सके।

यदि यह मामला सही तरीके से जांच के दायरे में आता है, तो आगर–सुसनेर वन विभाग का यह घोटाला प्रदेश के बड़े भ्रष्टाचार मामलों में शामिल हो सकता है। अब निगाहें प्रशासन और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं कि वे इस मामले में कितनी पारदर्शिता और सख्ती दिखाते हैं।

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